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|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 1 | 7.22p.1.1प्रक्षिप्तेषु प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥ | ||||||
| 2 | 7.22p.1.1aहर्षान्नादांस्तु विसृजन्निष्क्रान्तो वरुणालयात् । | ||||||
| 3 | 7.22p.1.1bमहोदरेण संयुक्तो हर्षगद्गदभाषिणा ॥ १ ॥ | ||||||
| 4 | 7.22p.1.2aततोश्मनगरं भूयो विचेरुर्युद्धदुर्मदाः । | ||||||
| 5 | 7.22p.1.2bयत्रापश्यद्दशग्रीवो गृहं परमभास्वरम् । | ||||||
| 6 | 7.22p.1.2cवैडूर्य तोरणाकीर्णं मुक्ताजालविभूषितम् ॥ २ ॥ | ||||||
| 7 | 7.22p.1.3aसुवर्णस्तम्भगहनं वेदिकाभिः समन्ततः । | ||||||
| 8 | 7.22p.1.3bवज्रस्फटिकसोपानं किङ्किणीजालसंयुतम् ॥ ३ ॥ | ||||||
| 9 | 7.22p.1.4aबह्वासनयुतं रम्यं महेन्द्रभवनोपमम् । | ||||||
| 10 | 7.22p.1.4bदृष्ट्वा गृहवरं रम्यं दशग्रीवः प्रतापवान् ॥ ४ ॥ | ||||||
| 11 | 7.22p.1.5aकस्येदं भवनं सौम्यं मेरुमन्दरसन्निभम् । | ||||||
| 12 | 7.22p.1.5bगच्छ ग्रहस्त शीघ्रं त्वं जानीष्व भवनोत्तमम् ॥ ५ ॥ | ||||||
| 13 | 7.22p.1.6एवमुक्तः प्रहस्तस्तु प्रविवेश गृहोत्तमम् ॥ ६ ॥ | ||||||
| 14 | 7.22p.1.7aस शून्यं प्रेक्ष्य तद्वारं पुनः कक्ष्यान्तरं ययौ । | ||||||
| 15 | 7.22p.1.7bसप्तकक्ष्यान्तरं गत्वा ततो ज्वालामपश्यत ॥ ७ ॥ | ||||||
| 16 | 7.22p.1.8aततो दृष्टः पुमांस्तत्र हृष्टो हासं मुमोच सः । | ||||||
| 17 | 7.22p.1.8bस तु श्रुत्वा महाहासमृर्ध्वरोमाऽभवत्तदा ॥ ८ ॥ | ||||||
| 18 | 7.22p.1.9aज्वालामध्ये स्थितस्तत्र हेममाली विमोहितः । | ||||||
| 19 | 7.22p.1.9bआदित्य इव दुष्प्रेक्ष्यः साक्षाद्यम इव स्थितः ॥ ९ ॥ | ||||||
| 20 | 7.22p.1.10aतथा दृष्ट्वा तु वृत्तान्तं स्वरमाणो विनिर्गतः । | ||||||
| 21 | 7.22p.1.10bविनिर्गम्याब्रवीत्सर्वं रावणाय निशाचरः ॥ १० ॥ | ||||||
| 22 | 7.22p.1.11aअथ राम दशग्रीवः पुष्पकादवरुह्य सः । | ||||||
| 23 | 7.22p.1.11bप्रवेष्टुमिच्छन्वेश्माथ भिन्नाञ्जनचयोपमः ॥ ११ ॥ | ||||||
| 24 | 7.22p.1.12aचन्द्रमौलिर्व पुष्मांच पुरुषोऽस्याग्रतः स्थितः । | ||||||
| 25 | 7.22p.1.12bद्वारमावृत्य सहसा ज्वालासक्तो भयानकः ॥ १२ ॥ | ||||||
| 26 | 7.22p.1.13aरक्ताक्षः श्वेतवदनो बिम्बोष्ठश्चोर्ध्वरोमवान् । | ||||||
| 27 | 7.22p.1.13bमहाभीषणनासश्च कम्बुग्रीवो महाहनुः ॥ १३ ॥ | ||||||
| 28 | 7.22p.1.14aगूढश्मश्रुर्निगूढास्थि दंष्ट्राभा रोमहर्षणः । | ||||||
| 29 | 7.22p.1.14bएतादृशं वै पुरुषं ददर्श स तु रावणः । | ||||||
| 30 | 7.22p.1.14cगृहीत्वा लोहमुसलं द्वारं विष्टभ्य सुस्थितम् ॥ १४ ॥ | ||||||
| 31 | 7.22p.1.15aअथ संदर्शनात्तस्य ऊर्ध्वरोमा बभूव सः । | ||||||
| 32 | 7.22p.1.15bअस्पन्दतास्य हृदयं वेपथुश्चाप्यजायत ॥ १५ ॥ | ||||||
| 33 | 7.22p.1.16aनिमित्तान्यमनोज्ञानि दृष्ट्वा राम व्यचिन्तयत् । | ||||||
| 34 | 7.22p.1.16bअथ चिन्तयतस्तस्य स एव पुरुषोऽब्रवीत् ॥ १६ ॥ | ||||||
| 35 | 7.22p.1.17aकिं त्वं चिन्तयसे रक्षो ब्रूहि विस्रन्धमानसः । | ||||||
| 36 | 7.22p.1.17bयुद्धातिथ्यमहं वीर करिष्ये रजनीचर ॥ १७ ॥ | ||||||
| 37 | 7.22p.1.18aएवमुक्त्वा स तद्रक्षः पुनर्वचनमब्रवीत् । | ||||||
| 38 | 7.22p.1.18bयोत्स्यसे बलिना सार्धं मया वा तद्विधीयताम् ॥ १८ ॥ | ||||||
| 39 | 7.22p.1.19aरावणोऽभिहितो भूय ऊर्ध्वरोमा व्यजायत । | ||||||
| 40 | 7.22p.1.19bअथ धैर्य समालम्ब्य रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ १९ ॥ | ||||||
| 41 | 7.22p.1.20aगृहेऽत्र तिष्ठते को वा तं ब्रूहि वदतांवर । | ||||||
| 42 | 7.22p.1.20bतेनैव सार्धं योत्स्यामि यथा वा मन्यते भवान् ॥ २० ॥ | ||||||
| 43 | 7.22p.1.21स एनं पुनरप्याह दानवेन्द्रोत्र तिष्ठति ॥ २१ ॥ | ||||||
| 44 | 7.22p.1.22aएष वै परमोदारः शूरः सत्यपराक्रमः । | ||||||
| 45 | 7.22p.1.22bवीरो बहुगुणोपेतः पाशहस्त इवान्तकः ॥ २२ ॥ | ||||||
| 46 | 7.22p.1.23aबालार्क इव तेजस्वी समरेष्वनिवर्तकः । | ||||||
| 47 | 7.22p.1.23bअमर्षी दुर्जयो जेता बलिर्हि गुणसागरः ॥ २३ ॥ | ||||||
| 48 | 7.22p.1.24aप्रियंवदः संविभागी गुरुविप्रप्रियः सदा । | ||||||
| 49 | 7.22p.1.24bकालकाङ्क्षी महासत्वः सत्यवाक्सौम्यदर्शनः ॥ २४ ॥ | ||||||
| 50 | 7.22p.1.25aस च सर्वगुणोपेतः शूरः स्वाध्यायतत्परः । | ||||||
| 51 | 7.22p.1.25bएष गर्जति वात्येष ज्वलते तपते सदा ॥ २५ ॥ | ||||||
| 52 | 7.22p.1.26aदेवैश्च भूतसंघैश्च पन्नगैश्च महर्षिभिः । | ||||||
| 53 | 7.22p.1.26bभयं यो नाभिजानाति तेन किं योद्धुमिच्छसि ॥ २६ ॥ | ||||||
| 54 | 7.22p.1.27aबलिना यदि ते योद्धुं रोचते राक्षसेश्वर । | ||||||
| 55 | 7.22p.1.27bप्रविश त्वं महासत्वं संग्रामं कुरु मा चिरम् ॥ २७ ॥ | ||||||
| 56 | 7.22p.1.28aएवमुक्तो दशग्रीवः प्रविवेश यतो बलिः । | ||||||
| 57 | 7.22p.1.28bस विलोक्याथ लङ्केशमट्टहासं जहास च ॥ २८ ॥ | ||||||
| 58 | 7.22p.1.29aआदित्य इव दुष्प्रेक्ष्यः स्थितो दानवसत्तमः । | ||||||
| 59 | 7.22p.1.29bअथ संदर्शनादेव बलिर्वै विश्वरूपवान् ॥ २९ ॥ | ||||||
| 60 | 7.22p.1.30aस गृहीत्वा च तद्रक्षो ह्युत्सङ्गे स्थाप्य चाब्रवीत् । | ||||||
| 61 | 7.22p.1.30bदशग्रीव महाबाहो कं ते कामं करोम्यहम् । | ||||||
| 62 | 7.22p.1.30cकिमागमनकृत्यं ते ब्रूहि त्वं राक्षसेश्वर ॥ ३० ॥ | ||||||
| 63 | 7.22p.1.31aएवमुक्तस्तु बलिना रावणो वाक्यमब्रवीत् । | ||||||
| 64 | 7.22p.1.31bश्रुतं मया महाभाग वद्धस्त्वं विष्णुना पुरा ॥ ३१ ॥ | ||||||
| 65 | 7.22p.1.32aसोहं मोचयितुं शक्तो बन्धनात्वां न संशयः । | ||||||
| 66 | 7.22p.1.32bएवमुक्ते ततो हासं बलिः कृत्वेदमब्रवीत् ॥ ३२ ॥ | ||||||
| 67 | 7.22p.1.33aश्रूयतामभिधास्यामि यं त्वं पृच्छसि रावण । | ||||||
| 68 | 7.22p.1.33bय एष पुरुषः श्यामो द्वारि तिष्ठति नित्यदा ॥ ३३ ॥ | ||||||
| 69 | 7.22p.1.34aएतेन दानवेन्द्राश्च तथाऽन्ये बलवत्तराः । | ||||||
| 70 | 7.22p.1.34bवशं नीता बलवता पूर्वं पूर्वतराश्च ये ॥ ३४ ॥ | ||||||
| 71 | 7.22p.1.35aबद्धश्चाहमनेनैवं कृतान्तो दुरतिक्रमः । | ||||||
| 72 | 7.22p.1.35bक एनं पुरुषो लोके वञ्चयिष्यति रावण ॥ ३५ ॥ | ||||||
| 73 | 7.22p.1.36aसर्वभूतापहर्ता वै य एष द्वारि तिष्ठति । | ||||||
| 74 | 7.22p.1.36bकर्ता कारयिता चैव धाता च भुवनेश्वरः ॥ ३६ ॥ | ||||||
| 75 | 7.22p.1.37aन त्वं वेद न चाहं वै भूतभव्यभवत्प्रभुम् । | ||||||
| 76 | 7.22p.1.37bकलिश्चैव हि कालश्च सर्वभूतापहारकः ॥ ३७ ॥ | ||||||
| 77 | 7.22p.1.38aलोकत्रयस्य सर्वस्य हर्ता स्रष्टा तथैव च । | ||||||
| 78 | 7.22p.1.38bसंहरत्येष भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ३८ ॥ | ||||||
| 79 | 7.22p.1.39aपुनश्च सृजते सर्वमनाद्यन्तो महेश्वरः । | ||||||
| 80 | 7.22p.1.39bकरणं कारणं कर्ता सोयं पुरुषसत्तमः ॥ ३९ ॥ | ||||||
| 81 | 7.22p.1.40aइष्टं चैव हि दत्तं च हुतं चैव निशाचर । | ||||||
| 82 | 7.22p.1.40bसर्वमेव हि लोकेशो धाता गोप्ता न संशयः ॥ ४० ॥ | ||||||
| 83 | 7.22p.1.41नैवंविधं महद्भुतं विद्यते भुवनत्रये ॥ ४१ ॥ | ||||||
| 84 | 7.22p.1.42aअहं त्वं चैव पौलस्त्य ये चान्ये पूर्ववत्तराः । | ||||||
| 85 | 7.22p.1.42bनेता तेषां महात्मैष पशुं रशनया यथा ॥ ४२ ॥ | ||||||
| 86 | 7.22p.1.43aवृत्रो दनुः शुकः शुम्भो निशुम्भो दम्भुरेव च । | ||||||
| 87 | 7.22p.1.43bकालनेमिश्च प्रह्लादस्तथा वैरोचनो बलिः ॥ ४३ ॥ | ||||||
| 88 | 7.22p.1.44aकालकेयास्तारकाख्यो मुचुकुन्दो विवर्धनः । | ||||||
| 89 | 7.22p.1.44bहिरण्याक्षो मधुश्चैव कैटभो धूमशम्बरौ ॥ ४४ ॥ | ||||||
| 90 | 7.22p.1.45aयमलार्जुनौ च कंसश्च कैटभो मधुना सह । | ||||||
| 91 | 7.22p.1.45bएते तपन्ति द्योतन्ति वान्ति वर्षन्ति चैव हि ॥ ४५ ॥ | ||||||
| 92 | 7.22p.1.46aसर्वैः क्रतुशतैरिष्टं सर्वैस्तप्तं महत्तपः । | ||||||
| 93 | 7.22p.1.46bसर्वे ते सुमहात्मानः सर्वे वै योगधर्मिणः ॥ ४६ ॥ | ||||||
| 94 | 7.22p.1.47aसर्वैरैश्वर्यमासाद्य भुक्तभोगैर्महत्तरैः । | ||||||
| 95 | 7.22p.1.47bदत्तमिष्टमधीतं च प्रजाश्च परिपालिताः ॥ ४७ ॥ | ||||||
| 96 | 7.22p.1.48aस्वपक्षेष्वनुगोप्तारः प्रहर्तारः परेष्वपि । | ||||||
| 97 | 7.22p.1.48bसमरेष्वपि लोकेषु नैतेषां विद्यते समः ॥ ४८ ॥ | ||||||
| 98 | 7.22p.1.49aशूरास्त्वभिजनोपेताः सर्वशस्त्रास्त्रपारगाः । | ||||||
| 99 | 7.22p.1.49bसर्वविद्याप्रवेत्तारः संग्रामेष्वनिवर्तकाः ॥ ४९ ॥ | ||||||
| 100 | 7.22p.1.50aसर्वैस्त्रिदशराज्यानि काङ्क्षितानि महात्मभिः । | ||||||
| 101 | 7.22p.1.50bयुद्धे सुरगणाः सर्वे निर्जिताश्च सहस्रशः ॥ ५० ॥ | ||||||
| 102 | 7.22p.1.51aदेवानामपि ये शक्ताः स्वपक्षपरिपालकाः । | ||||||
| 103 | 7.22p.1.51bप्रमत्ता भोगरक्ताश्च बालार्कसमतेजसः ॥ ५१ ॥ | ||||||
| 104 | 7.22p.1.52aयत्स देवान्प्रधर्षेत तदेषो विष्णुरीश्वरः । | ||||||
| 105 | 7.22p.1.52bउपायपूर्वकं नाशं संवेत्ता भगवान्हरिः ॥ ५२ ॥ | ||||||
| 106 | 7.22p.1.53aप्रादुर्भावं विकुरुते येनैतन्निधनं नयेत् । | ||||||
| 107 | 7.22p.1.53bपुनरेवात्मनात्मानमधिष्ठाय स तिष्ठति ॥ ५३ ॥ | ||||||
| 108 | 7.22p.1.54aएवमेतेन देवेन दानवेन्द्रा महात्मना । | ||||||
| 109 | 7.22p.1.54bते हि सर्वे क्षयं नीता बलिना कामरूपिणा ॥ ५४ ॥ | ||||||
| 110 | 7.22p.1.55aसमरे च दुराधर्षा नृपास्ते च पराजिताः । | ||||||
| 111 | 7.22p.1.55bतेन नीताः क्षयं सर्वे कृतान्तबलचोदिताः ॥ ५५ ॥ | ||||||
| 112 | 7.22p.1.56aएवमुक्त्वाऽथ प्रोवाच राक्षसं दानवेश्वरः । | ||||||
| 113 | 7.22p.1.56bयदेतदृश्यते वीर चक्रं दीप्तानलोपमम् ॥ ५६ ॥ | ||||||
| 114 | 7.22p.1.57aएतद्गृहीत्वाऽऽगच्छ त्वं मम पार्श्वं महाबल । | ||||||
| 115 | 7.22p.1.57bततोऽहं तव चाख्यास्ये मुक्तिकारणमव्ययम् ॥ ५७ ॥ | ||||||
| 116 | 7.22p.1.58aतत्कुरुष्व महाबाहो मा विलम्बस्व रावण । | ||||||
| 117 | 7.22p.1.58bएतच्छ्रुत्वा गतो रक्षः प्रहसंश्च महाबलः ॥ ५८ ॥ | ||||||
| 118 | 7.22p.1.59aयत्र स्थितं महद्दिव्यं कुण्डलं रघुनन्दन । | ||||||
| 119 | 7.22p.1.59bलीलयोत्पाटनं चक्रे रावणो बलदर्पितः ॥ ५९ ॥ | ||||||
| 120 | 7.22p.1.60aन च चालयितुं शक्तो रावणोऽभूत्कथंचन । | ||||||
| 121 | 7.22p.1.60bलज्जया स पुनर्भूयो यत्नंप चक्रे महाबलः ॥ ६० ॥ | ||||||
| 122 | 7.22p.1.61aउत्क्षिप्तमात्रे दिव्ये च पपात भुवि राक्षसः । | ||||||
| 123 | 7.22p.1.61bछिन्नमूलो यथा शाखी रुधिरौघपरिप्लुतः ॥ ६१ ॥ | ||||||
| 124 | 7.22p.1.62aएतस्मिन्नन्तरे जज्ञे शब्दः पुष्करसंभवः । | ||||||
| 125 | 7.22p.1.62bराक्षसेन्द्रस्य सचिवैर्मुक्तो हाहाकृतो महान् ॥ ६२ ॥ | ||||||
| 126 | 7.22p.1.63aततो रक्षो मुहूर्तेन चेतनां लभ्य चोत्थितम् । | ||||||
| 127 | 7.22p.1.63bलज्जयावनतीभूतं बलिर्वाक्यमुवाच ह ॥ ६३ ॥ | ||||||
| 128 | 7.22p.1.64aआगच्छ राक्षसश्रेष्ठ वाक्यं शृणु मयोदितम् । | ||||||
| 129 | 7.22p.1.64bयत्त्वया चौद्धृतं वीर कुण्डलं मणिभूषितम् ॥ ६४ ॥ | ||||||
| 130 | 7.22p.1.65aएतद्धि पूर्वजस्यासीत्कर्णाभरणमीक्ष्यताम् । | ||||||
| 131 | 7.22p.1.65bएतत्पतितमत्रैवमन्यद्भूयो महाबल ॥ ६५ ॥ | ||||||
| 132 | 7.22p.1.66aअन्यत्पर्वतसानौ हि पतितं कुण्डलादनु । | ||||||
| 133 | 7.22p.1.66bसुकुटं वेदिसामीप्ये पतितं युध्यतो भुवि ॥ ६६ ॥ | ||||||
| 134 | 7.22p.1.67aहिरण्यकशिपोः पूर्वं मम पूर्वपितामहात् । | ||||||
| 135 | 7.22p.1.67bन तस्य कालो मृत्युर्वा न व्याधिर्न विहिंसकाः ॥ ६७ ॥ | ||||||
| 136 | 7.22p.1.68aन दिवा मरणं तस्य न रात्रौ सन्ध्ययोरपि । | ||||||
| 137 | 7.22p.1.68bन शुष्केण न चार्द्रेण न च शस्त्रेण केनचित् । | ||||||
| 138 | 7.22p.1.68cविद्यते राक्षसश्रेष्ठ तस्य नास्त्रेण केनचित ॥ ६८ ॥ | ||||||
| 139 | 7.22p.1.69aप्रह्लादेन समं चक्रे वादं परमदारुणम् । | ||||||
| 140 | 7.22p.1.69bतस्य वादे समुत्पन्ने धीरो लोकभयंकरः ॥ ६९ ॥ | ||||||
| 141 | 7.22p.1.70aसर्वदृश्यस्य वीरस्य प्रह्लादस्य महात्मनः । | ||||||
| 142 | 7.22p.1.70bउत्पन्नो राक्षसश्रेष्ठ नृसिंहाकृतिरूपधृत् ॥ ७० ॥ | ||||||
| 143 | 7.22p.1.71दृष्टं च तेन रौद्रेण क्षुब्धं सर्वमशेषतः ॥ ७१ ॥ | ||||||
| 144 | 7.22p.1.72aतत उद्धृत्य बाहुभ्यां नखैर्निन्ये यमक्षयम् । | ||||||
| 145 | 7.22p.1.72bएष तिष्ठति द्वाः स्थो वै वासुदेवो निरञ्जनः ॥ ७२ ॥ | ||||||
| 146 | 7.22p.1.73aतस्य देवादिदेवस्य तत्वत्तो मे शृणुष्व ह । | ||||||
| 147 | 7.22p.1.73bवाक्यं परमभावेन यदि ते वर्तते हृदि ॥ ७३ ॥ | ||||||
| 148 | 7.22p.1.74aइन्द्राणां च सहस्राणि सुराणामयुतानि च । | ||||||
| 149 | 7.22p.1.74bऋषीणां सप्तसंख्यानां शतान्यब्दसहस्रशः । | ||||||
| 150 | 7.22p.1.74cवशं नीतानि सर्वाणि य एष द्वारि तिष्ठति ॥ ७४ ॥ | ||||||
| 151 | 7.22p.1.75aतस्य तद्वचनं श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् । | ||||||
| 152 | 7.22p.1.75bमया प्रेतेश्वरो दृष्टः कृतान्तः सह मृत्युना ॥ ७५ ॥ | ||||||
| 153 | 7.22p.1.76aपाशहस्तो महाज्वाल ऊर्ध्वरोमा भयानकः । | ||||||
| 154 | 7.22p.1.76bविद्युज्जिह्वश्च दंष्ट्रालः सर्पवृश्चिकरोमवान् ॥ ७६ ॥ | ||||||
| 155 | 7.22p.1.77aरक्ताक्षो भीमवेगश्च सर्वसस्वभयंकरः । | ||||||
| 156 | 7.22p.1.77bआदित्य इव दुष्प्रेक्ष्यः समरेष्वनिवर्तकः ॥ ७७ ॥ | ||||||
| 157 | 7.22p.1.78aपापानां शमिता चैव स मया युधि निर्जितः । | ||||||
| 158 | 7.22p.1.78bन च मे तत्र भीः काचिद्व्यथा वा दानवेश्वर ॥ ७८ ॥ | ||||||
| 159 | 7.22p.1.79एनं तु नाभिजानामि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥ ७९ ॥ | ||||||
| 160 | 7.22p.1.80aरावणस्य वचः श्रुत्वा बलिर्वैरोचनोऽब्रवीत् । | ||||||
| 161 | 7.22p.1.80bएष त्रैलोक्यधाता च हरिर्नारायणः प्रभुः ॥ ८० ॥ | ||||||
| 162 | 7.22p.1.81aअनन्तः कपिलो विष्णुर्नारसिंहो महाद्युतिः । | ||||||
| 163 | 7.22p.1.81bऋतधामा सुधामा च पाशहस्तो भयानकः । | ||||||
| 164 | 7.22p.1.81cद्वादशादित्यसदृशः पुराणपुरुषोत्तमः ॥ ८१ ॥ | ||||||
| 165 | 7.22p.1.82aनीलजीमूतसंकाशः सुरनाथः सुरोत्तमः । | ||||||
| 166 | 7.22p.1.82bज्वालामाली महाबाहुर्योगी भक्तजनप्रियः ॥ ८२ ॥ | ||||||
| 167 | 7.22p.1.83aएवं धारयते लोकानेष वै सृजते प्रभुः । | ||||||
| 168 | 7.22p.1.83bएष संहरते चैव कालो भूत्वा महाबलः ॥ ८३ ॥ | ||||||
| 169 | 7.22p.1.84aएष यज्ञश्च याज्यश्च चक्रायुधधरो हरिः । | ||||||
| 170 | 7.22p.1.84bसर्वदेवमयश्चैव सर्वभूतमयस्तथा ॥ ८४ ॥ | ||||||
| 171 | 7.22p.1.85aसर्वलोकमयश्चैव सर्वज्ञानमयस्तथा । | ||||||
| 172 | 7.22p.1.85bसर्वरूपी महारूपी बलदेवो महाभुजः ॥ ८५ ॥ | ||||||
| 173 | 7.22p.1.86aवीरहा वीरचक्षुष्मांस्त्रैलोक्यगुरुरव्ययः । | ||||||
| 174 | 7.22p.1.86bएवं मुनिगणाः सर्वे कथयन्तीह मोक्षिणः ॥ ८६ ॥ | ||||||
| 175 | 7.22p.1.87aय एनं वेत्ति पुरुषं न च पापैर्विलिप्यते । | ||||||
| 176 | 7.22p.1.87bस्मृत्वा स्तुत्वा तथेष्ट्वा च सर्वमस्मादवाप्यते ॥ ८७ ॥ | ||||||
| 177 | 7.22p.1.88aएतच्छ्रुत्वा च वचनं रावणो निर्ययौ तदा । | ||||||
| 178 | 7.22p.1.88bक्रोधसंरक्तनयन उद्यतास्त्रो महाबलः ॥ ८८ ॥ | ||||||
| 179 | 7.22p.1.89aतथाभूतं च तं दृष्ट्वा हरिर्मुसलधृत्प्रभुः । | ||||||
| 180 | 7.22p.1.89bनैनं हन्म्यधुना पापं चिन्तयित्वेति विश्वधृत् । | ||||||
| 181 | 7.22p.1.89cअन्तर्धानं गतो राम ब्रह्मणः प्रियकाम्यया ॥ ८९ ॥ | ||||||
| 182 | 7.22p.1.10न च तं पुरुपं तत्र ददर्श रजनीचरः ॥ १० ॥ | ||||||
| 183 | 7.22p.1.91a[ हर्षान्नादं विमुञ्चन्वै निष्क्रामन्यरुणालयात् । | ||||||
| 184 | 7.22p.1.91bयेनैव संप्रविष्टः स पथा तेनैव निर्ययौ ] ॥ ९१ ॥ |